व्यंग्य: एक थे मंत्री,एक थे विधायक

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राम मोहन चौकसे

विशेष:-यह एक काल्पनिक व्यंग्य है। पात्र यथार्थ हैं। राज नेताओं के गिरगिटिया रंग बदलने और खाकपति से रातों-रात करोड़पति हो जाने की दुर्घटनाओं से व्यथित होकर इस व्यंग्य का सृजन हुआ है। बुरा मानने वाले सिर्फ देश हित मे ईमानदार रहने का वचन दें।

कथा इस प्रकार है-
महाभारत में उल्लेख है कि हस्तिनापुर के महाराजा धृतराष्ट्र को युद्ध का वर्णन संजय ने सुनाया था। संजय महाराजा धृतराष्ट्र का दूत,सारथी और उस युग का दूरदर्शन था। संजय को दिव्य दृष्टि प्राप्त थी। महाभारत का युद्ध हुए युग बीत गए हैं। समय की चूक से कालचक्र की गणना में ऐसी गड़बड़ हुई कि संजय सुप्तावस्था में कलयुग में पहुंच गया। संजय के अचानक लुप्त होने पर हड़कम्प मच गया। आत्म ग्लानि से ग्रसित होकर समय स्वम् संजय को ढूढने निकल पड़े। इधर जाग्रत होने पर संजय ने स्वम को घने जंगल में पाया। संजय की सभी शक्तियां निश्चेत हो चुकी थी। जंगल मे भटकते हुए कई गांवों की पदयात्रा कर संजय भारत की हृदयस्थली की राजधानी पहुंच गया।

राजधानी की अट्टालिकाओं,चौबारों,सुवासित बाग-बगीचों,आधुनिक मशीनीकृत रथों की रेलमपेल,कर्कश ध्वनि से चिंघाड़ते मशीनीकृत रथ,उन्नत व्यवसाय के नवीनतम वातानुकूलित केंद्रों,रंग बिरंगे वस्त्रों में लिपटे नर-नारी को देखकर संजय चकित रह गया। भूख-प्यास से बेहाल संजय थक हार कर चौबारे के समीप स्थित विशाल बगीचे में पेड़ के नीचे बैठ गया। थकान के कारण संजय की नींद लग गई। नींद से जागने पर संजय ने देखा उसके पास मन्द-मन्द मुस्कान लिए एक बुजुर्ग बैठे हैं। बुजुर्ग ने कहा-बहुत परेशान दिख रहे हो। बुजुर्ग ने अपनी पोटली से मेवा,फल खाने को दिए। शीतल जल पीने को दिया। संजय की जान में जान आई।

बुजुर्ग के बहुत पूछने पर संजय अपने बारे में कुछ नहीं बता पाया। संजय की उत्सुकता थी यह कौन सी नगरी है। बुजुर्ग ने हंसकर कहा,यह विशाल नगरी एक मध्य राज्य की राजधानी है। इस राजधानी में ईमानदार कम बेईमान ज्यादा हैं। मौत के सौदागर चहुंओर घूम रहे हैं। बहशी भेड़ियों से नारी का स्वाभिमान,असितत्व खतरे में है। यहां राजा को प्रजा की नहीं अपनी चिंता है। राजा के नौकरशाह निरंकुश और भ्रष्ट हैं। राजनीति वेश्या हो गई है। बुजुर्ग ने कहा इस राजधानी में राजनीति करने वाले दो नेताओं का किस्सा सुना देता हूँ।

बुजुर्ग ने कहा एक साधारण प्राणी था। नेता बनने के पहले यह प्राणी रोजी रोटी के लिए निर्माण से जुड़े कार्य की ठेकेदारी करता था। राजनीति के विषाणु से संक्रमित होकर ठेकेदार राज्य के एक बड़े भ्रष्ट नेता का चारण बन गया समाज सेवा का लबादा ओढ़ लिया। अब नेता जी का एक ही काम था। प्रातः उठकर समाचार पत्रों में शोक संदेश पढ़ना। उनका पता दर्ज करना और विश्रामघाट में मृतक के अंतिम संस्कार में शामिल होना। नेता जी का नुस्खा कारगर साबित हो गया। धीरे धीरे राजधानी में इतना मुख प्रचार हो गया कि नेता जी बिना किसी स्वार्थ और रिश्तेदारी के लोगों के दुःख में शामिल होते हैं। नेता जी के अति भ्रष्ट राजनेता गुरु ने उनकी विचारधारा वाले दल में कुछ जिम्मेदार पद दिला दिया। चुनाव का वक्त आने पर एक उपखण्ड से टिकट दिलवा दिया। समाज सेवा का लबादा ओढ़े नेता अब जनप्रतिनिधि हो गए।

जनप्रतिनिधि रहते हुए पांच साल मौज में कटे। परिचय का क्षेत्र बढ़ गया। पांच साल में अगली पीढ़ी के सुख साधन की व्यवस्था हो गई। वक्त के साथ नेता जी भूतपूर्व हो गए। नेता जी के विरोधी दल वाले सत्ता का वरण कर ले गए। नेता जी ने समाजसेवा का लबादा फिर से ओढ़कर चौदह वर्ष वनवास के काटे। वनवास के बाद नेताजी के भाग्य जाग गए। भ्रष्ट राजनेता गुरु ने अपने शिष्य को एक बार फिर चुनाव मैदान में उतार दिया। दूसरे उपखण्ड से चुनाव लड़कर नेता फिर जनप्रतिनिधि बन गए। वरिष्ठता क्रम में होने के कारण मंत्री बन गए। लोगो को आशा थी कि समाजसेवी से नेता बने मंत्री समाज का कल्याण करेंगे। मंत्री ने अब देर नही की। दोनों हाथों से राज्य का खजाना उलीचना शुरू कर दिया। नेता जी जिनके यहां बिन बुलाए जाते थे। उन्हें पहचानने से मना कर दिया। जिन नारद वंशियो ने उनकी गाथा गाई। उन्हें नेताजी ने पीठ दिखाई। बिना चढ़ावा के काम नहीं करने का तरीका अपना लिया।

चंद महीनों में लोग नेता से मंत्री बने ढोंगी समाजसेवी के गिरगिटिया रंग को देखकर दंग रह गए। वक्त फिर बदला। मंत्री के मत वाली सरकार अल्पमत में आकर सत्ताच्युत हो गई। मंत्री बने नेता फिर सड़कों पर आ गए। इस बार मंत्री रहते हुए चार पीढ़ियों की व्यवस्था कर ली।

बुजुर्ग ने कहा बएक नेता जी का किस्सा और सुन लो। एक विधायक थे। तकनीकी शिक्षा की उपाधि पूरी नहीं कर सके तो नेता बनने का भूत सवार हो गया। मूल मगध प्रान्त के निवासी नेता ने एक प्रभावशाली मित्र की अंगुली थामकर एक बड़े व्यवसाय केंद्र में सुबह-शाम बैठक का स्थान बना लिया। शाम ढलने पर नए नवेले नेता अपने मित्र और उनके मित्रों की सूरा सेवा करते थे। इस सेवा में नेता के मित्र सुरा में गहराई तक उतर गए। नेता की दुकान चलने लगी।

चारण भाटों,चाटुकारों का हर युग मे बोलबाला रहा है। नेता जी भी चंद चाटुकारों के दम पर सत्तापक्ष के खिलाफ धरना, प्रदर्शन, मशाल जुलूसों ने नेता की छबि बना दी। लोकप्रियता के पायदान पर चढ़ते ही धार्मिक आयोजन,दरिद्र नारायण भोज,काव्य गोष्ठी, कविसम्मेलन,गरीबों की मदद के नाम पर हजारों की वसूली उनका प्रिय कार्य बन गया। चुनाव का समय आने पर छात्र राजनीति से जुड़े एक पुराने मित्र ने टिकट की व्यवस्था करा दी। पहली बार में नेता जी विधायक बन गए। विधायक बनने के बाद नेता जी उस उपखण्ड में भूलकर भी नहीं गए,जहां से विजय हासिल की। कभी एक प्याला चाय के तरसने वाले विधायक दुकान,जमीन, वाहनों के मालिक हो गए। एक कमरे के मकान में रहने वाले मकानों के स्वामी हो गए। पांच साल बाद चुनाव बेला में पुराने गरीब मित्र की मदद से पुनः टिकट पाने में सफल हो गए। राजनीति का मंजा हुआ खिलाड़ी पुराना गरीब मित्र भी अब अरबपति हो गया था। विधायक को घमंड था कि उनकी विजय सुनिश्चित है। सत्ता के मद में चूर विधायक ने मतदाताओं से मुलाकात करना उचित नही समझा। चाटुकारों की सलाह पर क्षेत्र में नही गए। परिणाम यह हुआ कि विधायक पूर्व हो गए।

बुजुर्ग के मुख से राजनीति और राजनेताओं के किस्से सुन संजय का मन विचलित हो गया। संजय ने बुजुर्ग से पूछा-ऐसा भी सम्भव है। बुजुर्ग ने कहा अभी तो राजनेताओं की जाति और चाल की बात बताई है। चरित्र की बात बताऊंगा तो एक ग्रंथ भी कम पड़ जायेगा। संजय ने फिर पूछा-आपको इन सच्चे किस्सों की जानकारी कैसे प्राप्त हो जाती है। बुजुर्ग ने लम्बी स्वांस लेकर कहा-मैं समय हूँ। तुम्हारे अचानक लुप्त होने पर तुम्हे खोजने निकला था। अब सौभाग्य से मिल गए हो। वापस अपने युग मे लौट चलते हैं। इतना कहकर बुजुर्ग ने संजय का हाथ पकड़ा और अंतर्ध्यान हो गए।
(लेखक मप्र के वरिष्ठ एवं शासन द्वारा अधिमान्य स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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