बैठे ठाले: धैर्य ही संकटकाल से मुक्ति की कुंजी

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राम मोहन चौकसे

विश्व के महान संत गोस्वामी तुलसीदास ने सुंदर चौपाई लिखी है-धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी। आपत काल परखिए चारी। । भावार्थ है-संकट काल में ही धैर्य, धर्म, मित्र और नारी को परखना चाहिए। लगभग 6 सौ वर्ष पूर्व संत तुलसीदास ने इन पंक्तियों को लिखते समय सबसे पहले धीरज पर जोर दिया है। धर्म को धीरज के बाद रखा है। इसका मतलब स्पष्ट है कि धीरज ही संकट काल से मुक्ति पाने की कुंजी है।

इस पृथ्वी पर जन्म लेने वाला कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है, जिस पर जिंदगी में कभी कोई संकट नहीं आया हो। अमीर, गरीब, जाति, धरम से परे किसी भी प्राणी पर संकट आ सकता है। आर्थिक, शारीरिक, सामाजिक संकट, ईर्ष्या, प्रतिशोध को संकट के प्रमुख कारक माना गया है। व्यापार, उद्योग में हानि, मस्तिष्क, हृदय, यकृत, कर्करोग जैसी शारीरिक व्याधि, चोरी, डकैती, दुराचार, व्याभिचार जैसी सामाजिक बुराइयों, ईर्ष्या और प्रतिशोध से ही संकट सर्वव्यापी है। यह ध्रुव सत्य है कि ऐसे संकट की घड़ी में अपने भी पराये हो जाते है। जब अपने ही पराये हो तो सिर्फ ईश्वर ही आश्रयदाता एवं मार्ग प्रशस्त करने वाली शक्ति है।

यह ईश शक्ति ही धीरज धारण करने की रामबाण औषधि है। धीरज नहीं होने पर प्राणी धर्म से विमुख हो जाता है। धर्म और अधर्म के अंतर को नहीं समझ पाता है। धर्म और अधर्म के संशय दूर करने में मित्र और नारी की बड़ी भूमिका होती है। नारी माँ, बहन, पुत्री अथवा ऐसी महिला हो सकती है, जो खून के रिश्ते से बंधी रहती है। मित्र भी वह सच्चा मित्र होता है जो अदृश्य रिश्ते की डोर से बंधा होता है। इस रिश्ते में स्वार्थ लेशमात्र भी नहीं होता है। संकट के समय मर्यादा की सीमा में बंधा प्राणी अपने मनोभाव नारी स्वरूपा माँ, बहन, पुत्री अथवा खून के रिश्ते से बंधी महिला से नहीं कर पाता है। तब सच्चा मित्र ही हर रहस्य का जानकार होकर संकट को हल करने का उपाय सुझाता है।

संकटकाल में जब अपने पराए हो जाते हैं तब हर स्वरूप में विद्यमान नारी एक अभेद्य किला बनकर ढाल का काम करती है। नारी का पवित्र स्पर्श मरहम का काम करता है। सामाजिक झंझावातों से जूझते हुए संकट में फंसे प्राणी को नारी ऐसे ज्ञात और अज्ञात कारकों को आभास नहीं होने देती है। नारी के सुझाए उपाय, प्रार्थना, अर्थ संचय की राशि, सेवा सुश्रेवा संकट को टाल देते हैं। महान संत गुसांईं तुलसीदास को नारी स्वरूपा उनकी धर्मपत्नि ने ही भगवान श्री राम के प्रति अनुराग जगाने के हेतु मार्ग प्रशस्त किया था। गुसांईं तुलसीदास पत्नी मोह के वशीभूत होकर मानसिक सन्ताप का शिकार हो गए थे।

आज के संदर्भ में देखा जाए तो विश्वव्यापी कोरोना महामारी पर संत गुसांईं तुलसीदास सीख दे रहे है कि धीरज ही इस संकट से मुक्ति का मार्ग है। धीरज खोने पर ही राक्षस प्रवृति वाले अधर्मियों ने धर्म का मार्ग छोड़ दिया है। इन अधर्मियों को मार्ग दिखाने के लिए कोई मित्र और नारी भी नहीं है। पूरा विश्व कह रहा है और मान रहा है कि धीरज रखकर भारतीय संस्कृति के अनुरूप घर पर सुरक्षित रहने से महामारी के संकट का निदान है।

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