हर घर की अपनी कहानी है

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बुरा जो देखन मैं चला….

राम मोहन चौकसे

अंधेरे में डूबी अट्टालिकाएं।अंधेरे को भगाने की कोशिश में लगा किसी कमरे का विद्युत प्रकाश पुंज।उदासी की दास्तां सुनाते बंगले।कांपते हाथों से डंडे को घुमाकर सन्नाटे से संघर्ष करता बूढ़ा चौकीदार।विशाल लोह दरवाजे की जालियों से झांकता अलसाया सा श्वान।जैसे उसे मालूम हो कि बड़ी गाड़ी अब इस दरवाजे से नही आती।इन महलनुमा घरों के सामने से गुजरने पर एहसास होता है कि हर घर की एक कहानी है।हर अपनी कहानी सुनाने को बेताब है।किसी को फुरसत ही नही कि दो पल ठहरकर घर की कहानी सुने।

होम्योपैथिक चिकित्सक मित्र ने सलाह दी कि मधुमेह पर नियंत्रण के लिए 5 किलोमीटर का पैदल भ्रमण अनिवार्य है।वैश्विक महामारी कोरोना के दौर में मारे दहशत के छह किलो वजन घटा तब चिकित्सक मित्र को दिखाने पर नियमित सुबह-शाम भ्रमण की सलाह मिली।मरता क्या न करता।शाम को नियमित घूमने का क्रम बना लिया।शुरुआत में लिंक रोड, होशंगाबाद रोड की लंबी चौड़ी सड़क पर भ्रमण किया।वाहनों की चिल्लपों,दुर्घटना के भय से सुनसान बस्तियों में भ्रमण का मन बना लिया।उम्मीद थी इन बस्तियों से गुजरते हुए घर के आंगन में बच्चों की किलकारियां सुनाई देंगी।शाम के झुरमुटे में चाय की प्याली के साथ बुजुर्ग दम्पति, युवा युगल के ठहाके सुनाई देंगे।मनोरम दृश्य होगा। राजधानी की सबसे महंगी, आलीशान बस्ती में एक सप्ताह के अंतराल में यह भ्रम टूट गया कि इन महलों, कोठियों में हंसी गूंजती है।

खोजने की प्रवृत्ति ने अंदर के पत्रकार को जगा दिया।पूरे माह भर इस बस्ती के सभी उप खण्डों में घूमने पर एक ही कहानी सामने आई कि कभी इन अट्टालिकाओं में खुशियों का बसेरा था।अब सन्नाटा पसरा है।मन नही माना तो एक बहुमंजिला भवन के बूढ़े चौकीदार के साथ बैठकर महल के दर्द को जाना। चौकीदार ने बताया कि साहब सरकारी महकमे में बहुत बड़े साहब थे।जवानी में साहब ने बड़े प्यार से संतान के लिए कोठी बनवाई थी।साहब के दो बेटे एक बेटी है।बेटी सयानी हुई तो ब्याह कर विदेश चली गई।दोनों बेटे भी पढ़ाई के लिए विदेश चले गए।पढ़ाई के बाद विदेश में नौकरी लग गई। पहले हर दिन माँ-बाप से टेलीफोन से बात होती थी।साहब की बड़ी चाहत थी कि बेटों का विवाह धूमधाम से करेंगे।एक बार खबर आई कि दोनों बेटों ने अपनेअपनी पसंद से शादी कर विदेश में ही बसने का फैसला कर लिया है।

बातचीत का जो सिलसिला पहले हर दिन का था।वह सप्ताह में एक बार,फिर माह में एक बार हो गया।नौबत यहां तक आ गई कि साल में एक बार बच्चों के साथ आने वाले बेटों ने अपने वतन ही आना बंद कर दिया।साहब जब भी बेटो से बात करना चाहते।बेटो का जबाव रहता,कितने रुपये बैंक एकाउंट ने भेजना है।साहब टूट गए। बीमार रहने लगे। रिटायर्ड बाप दोनों बेटों की राह तकते रहते। घर पर नौकरों की फौज थी।फिर भी घर काटने को दौड़ता था।एक बार ज्यादा बीमार होने पर साहब अस्पताल में भर्ती हो गए। रिश्तेदारों ने दोनों बेटों को खबर दी। बेटों ने छुट्टी नहीं मिलने की जानकारी देकर इलाज के पैसे भिजवाने की बात कही।रिश्तेदारों ने जब आखरी बार मिलने की सलाह दी तो बेटों ने कह दिया, अचानक मौत होने पर अंतिम संस्कार कर देना।हमारे आने का इंतजार मत करना। साहब दिल मे गम को पाले हुए चल बसे। अब बुजुर्ग माँ नौकरों के सहारे जिंदा है। 15 कमरों वाली कोठी के दो कमरे रोशन रहते हैं,जहां बुजुर्ग माँ रहती हैं। बूढ़े चौकीदार का कहना है कि बुजुर्ग माँ की मौत के बाद इस कोठी में चिराग भी रोशन नहीं होंगे।
जिस बस्ती का यहां जिक्र किया गया है।इस बस्ती में सबसे धनाढ्य लोग रहते है।इस बस्ती के लोग सिर्फ देश मे ही नहीं वरन विदेश में भी अपने नाम से पहचाने जाते हैं।इस बस्ती का हर घर अपनी कहानी सुनाना चाहता है।

राम मोहन चौकसे
प्रधान संपादक ” समरस” भोपाल

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