44 साल से नहीं थमा चिट्ठियां लिखने का सिलसिला

0
109

बुरा जो देखन मैं चला……

राम मोहन चौकसे

चिट्ठियों के आने और जाने का सिलसिला अब थम सा गया है।सौ में दस फीसदी ही लोग चिट्ठी लिखना पसन्द करते हैं।बहुत कम लोगो को याद होगा कि माता-पिता,भाई -बहन,रिश्तेदार अथवा मित्र को अंतिम बार कब चिट्ठी लिखी थी।चौबीस घण्टे जेब मे उपलब्ध अत्याधुनिक तकनीक से लैस मोबाइल ने इस चिट्ठीबाजी पर ग्रहण लगा
दिया है।अगर आपसे कहा जाए भोपाल और इंदौर में रहने वाले दो अभिन्न मित्र ऐसे हैं,जो पिछले 43 साल से एक दूसरे को प्रति दिन चिट्ठी लिख रहे हैं। शायद किसी को भरोसा नही होगा।30 जून 2020 को उन दोनों मित्रों की चिट्ठीबाजी के 44 साल पूरे हो जाएंगे।

राजधानी भोपाल के मातमन्दिर क्षेत्र के पास सानिया परिसर,गीतांजलि काम्प्लेक्स में शरद भारद्वाज रहते हैं।बेहद हंसमुख,मिलनसार, मृदुभाषी,समाजसेवी और व्यवसायी शरद भारद्वाज इंदौर निवासी अपने परम मित्र सुधाकर जोशी को प्रतिदिन एक पत्र लिखते है।सुधाकर जोशी भी प्रतिदिन एक पत्र शरद भारद्वाज को लिखते हैं।सर्दी,गर्मी, बरसात, आंधी, तूफान,बीमारी भी इस सिलसिले को नही तोड़ सकी है।

शरद भारद्वाज ने बताया स्टेट बैंक से सेवा निवृत्त सुधाकर जोशी कालेज में उनके साथ पढ़ते थे।दोनों पक्के दोस्त थे।कोई भी सामान खरीदने साथ जाते थे।दोनों मित्र छावनी इंदौर के निवासी थे।परिस्थिति वश शरद भारद्वाज भोपाल आकर बस गए।सुधाकर जोशी बैंक में नौकरी करने लगे। दोस्त की जुदाई ने चिट्ठी लिखने की प्रेरणा दी। चिठ्टी लिखने की शरुआत 15 पैसे के पोस्टकार्ड से हुई। शुरुआत में यह सिलसिला अनियमित था। 1 जुलाई 1977 से नियमित चिट्ठी लिखने का सिलसिला अब तक नही रुका है। 30 जून 2020 को पूरे 44 साल हो जाएंगे।

धीर, गम्भीर संकोची स्वभाव के शरद भारद्वाज हवा महल रोड भोपाल में पहले सीट कवर बनवाने का काम करते थे। बाद में उन्होंने भागीदारी में हमीदिया रोड स्थित दुकान से विद्युत मोटर बेचने का काम शुरू किया।जो अभी तक चल रहा है।शरद भारद्वाज ने बताया अब ढाई रुपये के डाक टिकट लगाकर अंतर्देशीय पत्र में मन की भावनाओ को उकेरते है। एक बार अंतर्देशीय पत्र नहीं मिलने पर हल्के हरे रंग के कागज को हूबहू अंतर्देशीय पत्र के आकार का कटवाकर ढाई रुपये का डाक टिकट लगाकर भी भेजा।

एक बार भोपाल के मुख्य डाकघर में दो रुपये के टिकट मिलना बंद हो गए।पोस्टमास्टर से शिकायत करने पर हल नहीं निकला तो प्रधानमंत्री कार्यालय में शिकायत कर दी।शिकायत करने के दूसरे दिन पोस्ट ऑफिस में न सिर्फ दो रुपये के टिकट मिलना शुरू हो गए वरन पोस्ट ऑफिस वाले शरद भारद्वाज को ढूंढते हुए घर आ गए।शरद भारद्वाज ने बताया कि खत लिखने में कोई सीमा का बंधन नहीं है। हर दिन के क्रिया कलाप का जिक्र भी पत्र में होता है। हर दिन चिट्ठी लिखने से अलग अलग शहर में रहने का आभास नही होता है।उन्होंने बताया कि उनके दिल के ऑपरेशन के समय भी आई सी यू में भर्ती रहने के बावजूद चिट्ठी लिखी है।रात को ढाई बजे सबसे छुपकर पोस्ट ऑफिस के डिब्बे में चिट्ठी डाली है। सबसे बड़ी बात यह है कि दोनों मित्रों के पास अभी तक लिखी गई सभी चिट्ठियां सुरक्षित हैं।

शरद भारद्वाज और सुधाकर जोशी के इस अनूठे काम को लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड में स्थान मिल चुका है।गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड के कवरपेज पर भी इसका जिक्र है। देश के प्रमुख समाचार पत्रों, न्यूज़ चैनल पर दोनों मित्रो की चिट्ठीबाजी के चर्चे हो चुके हैं।शरद भारद्वाज का कहना है जब तक जीवन है, यह चिट्ठीबाजी यूं ही चलती रहेगी।
राम मोहन चौकसे,प्रधान संपादक समरस, भोपाल।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here