हम ना भिखारी हैं,और ना मजदूर

0
29

बुरा जो देखन मैं चला….

राम मोहन चौकसे
फरवरी माह की बात है।महाराणा प्रताप नगर की मेरी पसंदीदा होटल में मित्रो के साथ चाय पी रहा था कि अचानक वह दिखाई दिया। पहचानने में दिक्कत इसलिए नही हुई क्योंकि वह बांए हाथ की कोहनी के आगे का अंग किसी दुर्घटना में गवां चुका था। बोर्ड ऑफिस के चौराहे पर चारो ट्राफिक सिग्नल पर घूम घूम कर भीख मांगना उसकी दिनचर्या थी।अचानक वह एक साल बाद दिखाई दिया था।उत्सुकतावश मैंने ही उसे रोककर पूछा,आजकल दिखाई नही दे रहे हो।उसने सहज भाव से कहा कि आजकल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में हूँ।
रायपुर में रहने का कारण पूछने पर उसने बताया कि भोपाल में दिन भर में पांच सौ रुपए भिक्षावृत्ति में मिलते थे।रायपुर के जयस्तंभ चौक पर भीख मांगने से एक हजार रुपए,चाय,नाश्ता,दोनों वक्त निःशुल्क भोजन प्रतिदिन मिल जाता है।रात ढलने पर पार्क अथवा दुकानों के सामने सोना,सार्वजनिक शौचालय में नित्य क्रिया,स्नान हो जाता है।ट्रैन में भी भीख मांगते हुए आना -जाना हो जाता है।अब चौकने की बारी मेरी थी। भिक्षावृत्ति में एक हजार रुपए नगद,चाय, नाश्ता, दोनों वक्त के भोजन के चार सौ रुपए ही मान ले तो चौदह सौ रुपए प्रतिदिन।
मेरी रुचि जागी तो भगवानदास उर्फ भग्गू ने बताया कि रचना नगर के पास पट्टे वाली झुग्गी है। पत्नी सात-आठ घरों में बर्तन मांजकर आठ हजार रुपए कमा लेती है। दो बेटियां ब्याह चुकी है।वयस्क पुत्र मिस्त्री का काम कर महीने में पंद्रह हजार रुपए कमा लेता है।गरीबी रेखा वाले राशन कार्ड से गेंहू, दाल ,चावल चंद रुपयों में मिल जाता है। झुग्गी में चार बकरियां पाल रखी है।दूध की व्यवस्था है। पुत्र को साठ हजार मूल्य की नई मोटर साइकिल खरीदकर दी है।ईश्वर की कृपा से जिंदगी गुजर रही है। भग्गू को चाय पिलाकर विदा किया। भग्गू जाते जाते चिंतन का विषय दे गया।
भग्गू को ही उदाहरण मान लिया जाए तो भग्गू के परिवार की मासिक आय 53 हजार रुपए है।जो साल भर में 6 लाख 36 हजार रुपए होती है।सस्ती दर पर राशन लेकर,निःशुल्क इलाज, निःशुल्क शिक्षा,सरकारी मद से बच्चों की शादी जैसे अन्य लाभ लेने वाले झुग्गी में रहने वाले भग्गू जैसे लोग गरीब हैं,अथवा एकल व्यक्ति की आय वाले परिवार है।जहां माह की निर्धारित राशि मिलने के पहले दूध,रसोई गैस,बच्चों की स्कूल,कालेज फीस,मकान का किराया, बिजली का बिल,पेट्रोल का खर्च, तीज-त्यौहार का खर्च,शादी समारोह में उपहार देने,मेहमानो की आवभगत, बीमारी के खर्च के नाम पर पूरी तनख्वाह की पाई-पाई का हिसाब हो जाता है। यक्ष प्रश्न यह है कि भीख मांगकर औसत 15 सौ प्रतिदिन कमाने वाला भग्गू गरीब है,अथवा निर्धारित तनख्वाह पर काम करने वाला सरकारी कर्मचारी या वह छोटा व्यापारी गरीब है जो हर रोज कुआं खोदकर पानी पीता है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के विश्व व्यापी अध्ययन 2020 के अनुसार 90 हजार रुपए से कम सालाना आय वाले गरीब, 90 हजार से 2 लाख के बीच सालाना आय वाला निम्न मध्यम वर्गीय तथा 2 से 5 लाख वार्षिक आय वाला मध्यम वर्ग से आता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत की कुल आबादी का 28 फीसदी मध्यमवर्गीय है।इसमें 14 फीसदी निम्न मध्यम वर्गीय तथा 3 फीसदी उच्च मध्यम वर्गीय है। यह कटु सत्य है कि हम ना भिखारी हैं, और ना मजदूर है।

राम मोहन चौकसे
प्रधान संपादक “समरस”,भोपाल।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here