गुमनामी के अंधेरे में खो गए राजनेता

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बुरा जो देखन मैं चला….

 

सांप -सीढ़ी का खेल है राजनीति

राम मोहन चौकसे

newsराजनीति सांप-सीढ़ी का खेल है। सीढ़ी चढ़ने पर आसमान की ऊंचाई मिलती है। सांप के डसने पर सिर्फ जमीन ही नजर आती है। मध्यप्रदेश की राजनीति में ऐसे भी मुकाम आए हैं जब फर्श पर रहने वालों नेताओं ने अर्श की ऊंचाई हासिल की है। कभी अर्श पर रहने कई नेताओं के खाते में जमीन ही नजर आई है।

मप्र में भाजपा, कांग्रेस की राजनीति करने वाले ऐसे दर्जनों नेता है, जो कभी आसमान के चमकते सितारे रहे। आज उन्हें कोई पूछने वाला नही है। यह राजनेता कभी सैकड़ो समर्थकों की भीड़ से घिरे रहते थे। चुनाव की बेला में समर्थकों की टिकट का फैसला करते थे। आज खुद की टिकट के लिए तरसते रहते हैं। ऐसे अनेक नेता गुमनामी के अंधेरे में खो गए है। मप्र के नेताओ को चार प्रकार की श्रेणियों में रखा जा सकता है। एक वह जो अपने दम पर सीढियां चढ़कर ऊपर तक पहुंचे है। दूसरे वह जो अपने आका की दम राजनीति कर पाते हैं। ऐसे नेताओं को अपने आकाओं के घर की सब्जी लाने से लेकर हर समय झंडाबरदारी करना पड़ती है। तीसरे वह नेता जो कभी जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर की राजनीति कर चुके है। आज उन्हें कोई पूछने वाला भी नही है। चौथे वह नेता जिन्हें राजनीति बिना मेहनत के विरासत में मिली है।

मप्र में कांग्रेस की बात करें तो सबसे उम्र दराज नेताओं में मोतीलाल लाल वोरा का नाम आता है। यह अलग बात है कि मप्र के विभाजन के बाद वोरा जी छत्तीसगढ़ के नेता हो गए। वोरा जी भाग्यशाली हैं, जो बुजुर्ग होने के बाद भी कांग्रेस में ससम्मान अच्छे मुकाम पर हैं। मप्र के पहले मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल के सुपुत्र पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण, पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण कद्दावर नेता थे। अब उनके परिवार में अमितेश ही राजनीति में सक्रिय है। राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र, पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश चंद सेठी की बात करें तो उनके जाने के बाद उनके परिवार में राजनीति में किसी ने रुचि नही ली। पूर्व मुख्यमंत्री स्व.अर्जुन सिंह को राजनीति का महारथी माना जाता था। वे अ. भा. संगठन के पदाधिकारी से लेकर राज्यपाल, केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री रहे। उनके पुत्र अजय सिंह राहुल विधायक, मंत्री, नेता प्रतिपक्ष रह चुके है। अभी उनकी पूछ परख नहीं है।
सबसे चर्चित और हमेशा विवादों में रहने वाले मप्र के कद्दावर नेता संसद दिग्विजय सिंह ही एक मात्र नेता है, जो हर दौर में फायदे में रहे। न.पा.अध्यक्ष से राजनीति की शुरुआत करने वाले दिग्विजय सिंह कांग्रेस अध्यक्ष, केंद्रीय मंत्री, लोक सभा, राज्य सभा सदस्य, मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उनके छोटे भाई लक्ष्मण सिंह भाजपा में जाकर वापस कांग्रेस में स्थापित हैं। विधायक लक्ष्मण सिंह भले ही नेपथ्य में हो लेकिन दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन दूसरी बार विधायक बन मंत्री रह चुके है। कांग्रेस के कद्दावर नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया का जिक्र जरूरी है, जो अब भाजपा के राज्यसभा सदस्य है। उनके भाजपा में शामिल होने से कांग्रेस को बहुत बड़ा नुकसान हुआ है।

कांग्रेस के बड़े नेता नरसिंहगढ़ के पूर्व महाराजा भानुप्रताप सिंह, पूर्व विधान सभा अध्यक्ष गुलशेर अहमद, हंसराज भारद्वाज बालकवि बैरागी, विद्याधर जोशी, कैलाश नाथ काटजू, राधाकृष्ण मालवीय, रसूल अहमद सिद्दीकी, हसनात सिद्दीकी, सुभाष यादव, विद्यावती चतुर्वेदी कद्दावर नेता थी।
कभी अ. भा.सेवादल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे श्री जोशी अब परिदृश्य से बाहर है। बड़े नेता महेश जोशी, पूर्व अध्यक्ष सुरेश पचौरी, अरुण यादव, रामेश्वर नीखरा, सत्यव्रत चतुर्वेदी, मानक अग्रवाल, प्रताप भानु शर्मा, नर्मदा प्रसाद शर्मा, राजमणि पटेल, सुरेंद्र सिंह ठाकुर, जोधाराम गुर्जर, राजकुमार पटेल, मृणाल पन्त, विकल्प डेरिया, प्रदीप चौहान, छोटा बाबू राय, सुनील सूद, अतुल शर्मा, विनोद डागा, गुलाब सिंह सुस्तानी, राज्यवर्धन सिंह, रमेश सक्सेना, जितेंद्र डागा, हुकुम सिंह कराडा, सोबरन सिंह मवई के पुत्र एवं ज्योतिरादित्य सिंधिया के विरोधी प्रबल प्रताप , वीर सिंह रघुवंशी, दिनेश गुर्जर, कांतिलाल भूरिया, बाला बच्चन, महेंद्र चौहान, महेंद्र बुंदेला, सुनील सिंघई, जवाहर पंजाबी, दीपचंद यादव, मधु गार्गव, डॉ राजकुमार बिसरिया, जहीर अहमद, राजकुमार वर्मा, कैलाश वेगवानी सहित दर्जनों नेता है। जो कांग्रेस में हैं। अब उन्हें कोई पूछ नही रहा है।

भाजपा में बुजुर्ग नेताओ में कैलाश सारंग ऐसे नेता है जो विरासत में पुत्र विश्वास को राजनीति सौंप चुके हैं। स्व. कुशा भाऊ ठाकरे, प्यारेलाल खंडेलवाल, बाबूलाल गौर, कैलाश जोशी, सुंदर लाल पटवा का नाम कद्दावर नेताओं में शुमार है। बाबूलाल गौर की पुत्रवधू कृष्णा गौर, पटवा जी के दत्तक पुत्र सुरेंद्र पटवा, कैलाश जोशी के पुत्र दीपक जोशी विरासत की राजनीति कर रहे हैं। पूर्व सांसद रघुनंदन शर्मा, शैलेंद्र प्रधान, रमेश शर्मा गुट्टू, सांसद रमाकांत भार्गव, नन्दकिशोर चौहान, राकेश सिंह, आलोक संजर, अर्चना चिटणीस, रंजना बघेल, दो बार की सांसद माया सिंह, पूर्व मन्त्री ध्यानेन्द्र सिंह, भरत चतुर्वेदी, राकेश सिंह चतुर्वेदी, गौरी शंकर शेजवार, फग्गन सिंह कुलस्ते, सत्यनारायण जटिया, नजमा हेपतुल्ला, प्रभात झा, विक्रम वर्मा, वीर सिंह रघुवंशी, अजीत सिंह रघुवंशी, लक्ष्मीकांत शर्मा, राघव जी, संजय पाठक, डॉ हितेश वाजपेयी, उमाशंकर गुप्ता, सुरेंद्र नाथ सिंह सहित दर्जनों नेता हैं। जो पहले पार्षद, विधायक, मंत्री, सांसद थे। अब उनकी कोई पूछ परख नही है।

हालात यह है कि भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति के नक्षत्र रहे लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती अब मार्गदर्शक की भूमिका में हैं। यही हाल मप्र में भाजपा और कांग्रेस के नेताओं की हैं। कांग्रेस में तो हालात और भी बदतर होते जा रहे हैं। मप्र में कमलनाथ यानि कांग्रेस, कांगेस यानि कमलनाथ हो गया है। कार्यकताओं को नापसंद करने वाले कमलनाथ ही अध्यक्ष, पूर्व मुख्यमंत्री और सम्भावित नेता प्रतिपक्ष हैं। अति महत्वकांक्षा के चलते कांग्रेस के किसी नेता को वह आगे बढ़ता नही देखना चाहते हैं। मप्र में होने वाले 27 विधानसभा के उपचुनाव में कांग्रेस और भाजपा की अग्नि परीक्षा है। दोनों दलों के उपेक्षित कार्यकर्ता और नेताओं ने हिसाब चुकाने की ठान ली है।

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