हमारा कोई दुश्मन नहीं,हम अपने दुश्मन हैं

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बुरा जो देखन मैं चला,,,,,।

 

हमारा कोई दुश्मन नहीं,हम अपने दुश्मन हैं

राम मोहन चौकसे

 

भोपाल।मीडिया को लेकर यदा कदा की जाने वाली आलोचना,टिप्पणीयों के मूल में मीडिया वाले ही दोषी है।मीडिया से जुड़ा सत्तर फीसदी तबका बाजारवाद के जाल में उलझकर अपनी ही जड़ें काट रहा है।बात प्रिंट मीडिया,इलेक्ट्रानिक मीडिया अथवा मीडिया की नई विधा सोशल मीडिया की हो।पूरा मीडिया जातिवाद,क्षेत्र वाद,परिवारवाद की तर्ज पर समूहों में बंटा नजर आता है।

 

दरअसल मीडिया भी दो प्रकार का है।एक मीडिया अपने परिवार को पालने के लिए निष्ठा से नौकरी कर रहा है।दूसरा मीडिया भरे पेट वाला है।भरे पेट वाला मीडिया अपनी संपत्ति लाखों,करोड़ों करने के फेर में हर हथकंडा अपनाता है।दूसरे प्रकार के मीडिया में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया  के मालिक भी शामिल हैं।यह दोनों सत्ता की मलाई खाने के लिए हर सरकार के पिछलग्गू बन जाते है।मीडिया मालिक और वरिष्ठ मीडिया कर्मी अपने स्वार्थ के लिए कनिष्ठ का शोषण करने और बलि चढ़ाने में पीछे नहीं रहते हैं। यह मीडिया का दुर्भाग्य है कि मीडियाकर्मी का शोषण करने वाला वरिष्ठ मीडिया कर्मी होता है।वरिष्ठ मीडियाकर्मी के स्वार्थ की पूर्ति नहीं होने पर मालिक की जूतियां सिर पर रखकर घूमने वाला वरिष्ठ अपने कनिष्ठ को दूध की मक्खी की तरह फेंक देता है।पूरी दुनिया के शोषण की लड़ाई लड़ने वाला मीडिया कर्मी अपने शोषण की लड़ाई  नहीं लड़ पाता है।

 

मीडिया की कार्य शैली,आचरण में तब्दीली अचानक नहीं आई है।बरसों से यह परिपाटी चली आ रही है।पुराने दौर में चंद पत्रकार,संपादक और मीडिया घरानों के मालिक मलाई खाते थे।कहीं कोई विरोध नहीं होता था।पोषक सत्ताधीश,भ्र्ष्टाचार में लिप्त रहने वाले चंद अफसर अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए मीडिया के कंधे पर बैताल की तरह सवार हो जाते थे।उस दौर में नई पीढ़ी के पत्रकारों को ऐसे कृत्यों में लिप्त रहने वाले वरिष्ठ और गरिष्ठ आदर्श का पाठ पढ़ा देते थे।ईमानदार युवा पत्रकारों की हाड़ तोड़ मेहनत से स्वार्थलिप्त वरिष्ठ सौदेबाजी से अपनी जेब भरते थे।

 

सिर्फ तीन उदाहरण ही मीडिया की सौदेबाजी के लिए काफी हैं।वैसे तो पूरी किताब लिखी जा सकती है।पहला उदाहरण यह है कि पूरे विश्व की भीषणतम दुर्घटना यूनियन कार्बाइड गैस रिसन कांड के लिए मीडिया ही दोषी है।यह मेरा दावा है। 2 और 3 दिसम्बर की दरम्यानी रात यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से गैस रिसने का पहला मामला नही था।इसके पहले भी दो बार गैस रिस चुकी थी।जिसमे दो लोगों और जानवरों की मौत हो चुकी थी।साल में एक बार भोपाल के श्यामला हिल स्थित यूनियन कार्बाइड के रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर में दी जाने वाली पार्टी में मीडिया के वरिष्ठों को शराब और शबाब के साथ मोटे लिफाफे दिए जाते थे। साल भर यूनियन कार्बाइड की खबरे दबाई जाती थी। दूसरा उदाहरण भाजपा के वरिष्ठ मंत्री का है। अपने विधायक कार्यकाल में पूर्व मंत्री उस दौर के बड़े अखबार के एक वरिष्ठ सहयोगी की सेवा  में हर दिन मुंगोड़े,रबड़ी, मूंगफली और अन्य प्रसादी चढ़ाते थे। 365 दिन उनकी खबरें छपती थी।खबरों की दम पर भाजपा से टिकट मिल जाता था। तीसरा उदाहरण  स्वर्गवासी वरिष्ठ पत्रकार का है।उस समय 150 रुपये की तनख्वाह के बाद भी 12 मकानों के मालिक बन गए।भतीजो की नौकरी ब्याज में लग गई।सुरा की बदनामी के साथ चरित्र पर छींटे भी वरिष्ठों के दामन पर हैं।

 

मीडिया घरानों के मालिक और मालिकों के चाटूकार वरिष्ठ  कभी नहीं चाहते थे कि उनके अधीनस्थ नया नवेला सत्ता की मलाई का स्वाद चख सके।सोशल मीडिया के तेजी से प्रचलन के बाद मीडिया घरानों और चाटूकार वरिष्ठों के सभी पत्ते खुल गए।पहले गोपनीय जानकारी सांकेतिक भाषा मे खबरों में परोसी जाती थी।इससे सौदेबाजी में आसानी होती थी।अब यह जानकारी उस आम पाठक के पास उपलब्ध है।जो मीडिया को अजूबा अथवा मीडिया की आड़ में घी पीने वालों को आदर्श मानता था।

 

बदलते दौर में मीडिया से अपनी रोटी वाले चंद मीडियाकर्मी आज भी किसी राजनेता,राजनैतिक दल के जर खरीद गुलाम की भूमिका निभा रहे हैं। बैनर की आड़ में राजनेता को अपना पिता लिखने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं। सच कहने और लिखने का साहस और सलीका  अब नहीं बचा है।जिला स्तर से लेकर प्रान्त और प्रान्त से लेकर राष्ट्र स्तर के मीडिया कर्मी के चाल,चरित्र और सृजन से स्पष्ट परिलक्षित हो गया है कि वे स्वार्थ केे लिए जूते भी चाट सकते हैं।इलेक्ट्रानिक मीडिया में यह रोग बढ़ता ही जा रहा है।यह मीडिया दल विशेष,वर्ग विशेष,विचार विशेष से प्रभावित है।मीडिया का स्वतंत्र असितत्व खत्म होता जा रहा है।बड़े उद्योग घरानों के मीडिया हाउस और चैनल हैं।बड़े वेतन पर काम करने वाला संपादक नाम का व्यक्ति मीडिया घरानों के इशारों पर कहानी गढ़ता है।संपादक नाम का व्यक्ति अब प्रबंधक बनकर रह गया है।बड़े नाम वाला संपादक मन माफिक काम नही करने पर बेआबरू होकर बाहर भी दिखाई देता है।

 

मीडिया की अजीब सी परिपाटी है।अपने स्वर्णिम काल मे वरिष्ठ अपने सहपाठियों की जान बूझकर उपेक्षा करता है।पूरे जमाने की खबर देने वाला मीडिया अपनों के समाचार के तरस जाता है।मीडिया घरानों की प्रतिद्वंदता मीडिया कर्मियीं के आचरण में उतर आती है।मीडिया के लोगों की आपसी ईर्ष्या में किसी भी मीडियाकर्मी के रचनात्मक कार्य, सम्मान,पुरस्कार,उपलब्धि को स्थान नहीं मिल पाता है।मीडिया वाला ही मीडिया वाले का दुश्मन नजर आता है।सामाजिक सरोकार,आपसी मेलजोल,ओपचारिक परिचय की परम्परा खत्म होती जा रही है।व्यावसायिक द्रष्टिकोण ने मीडिया का सबसे बड़ा नुकसान किया है।हमारा कोई दुश्मन नहीं,हम अपने दुश्मन हैं।

 

,,लेखक मप्र के वरिष्ठ एवं राज्य स्तरीय अधिमान्य स्वतंत्र पत्रकार हैं,,

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