तालियां बजाते रहिए…..।.

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व्यंग्य

तालियां बजाते रहिए…..।

राम मोहन चौकसे

तालियां और गालियां दुनियां में सबसे प्रचलित प्रक्रिया हैं।यह प्रक्रिया प्रतिक्रिया के गर्भ से जन्म लेती है।तालियों और गालियों का सीधा संबंध तो नहीं है,लेकिन जन्म से मृत्यु तक दोनों समानांतर पटरी पर चलती रहती हैं।मन को प्रफुल्लित करने वाले काम के पूर्ण होने पर तालियां बजाना और मनमाफिक काम नहीं होने पर गालियां सुनना और सुनाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।
दुनियां में भारत ही एक मात्र देश है,जहां नेता नाम की प्रजाति वालेआदमी के खाते में सर्वाधिक तालियां और गालियां आती हैं।गालियां जहाँ सैकड़ों किस्म की हैं वहीं तालियां भी कई प्रकार की होती हैं।गालियों का मूल मकसद सिर्फ कोसना है। तालियों का मूल मकसद प्रशंसा है। तालियों का स्वरूप समय के अनुसार बदलता रहता है। गालियों पर बंदिशों का बंधन है। सार्वजनिक स्थान,धार्मिक स्थलों,संवैधानिक संस्थानों,शैक्षणिक संस्थानों में गालियां बकने की बंदिश है।तालियां स्वतंत्र रूप से कहीं भी बजाई जा सकती हैं।


मंदिरों में सुबह-शाम की आरती,भजन संध्या,साहित्यिक,सामाजिक,धार्मिक आयोजन,राजनेताओं की चुनावी,गैर चुनावी सभाएं,विरोध प्रदर्शन के बाद नारे के साथ,ट्रेड यूनियन के जलसे, नगर सेवक(पार्षद), आमदार(विधायक), खासदार(सांसद) को टिकट मिलने पर,जीतने पर,नौकरी लगने,सेवानिवृत्त होने पर, नए उपक्रम के भूमि पूजन,शुभारंभ होने पर,तालुका से लेकर राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार मिलने पर तथा सेना के सम्मान में तालियां बजाई जाती हैं।
तालियां जोश भरने का काम करती हैं।गालियां होश खोने का काम करती हैं।मदहोश को होश में लाने के लिए भी तालियां बजाई जाती हैं।तालियों का विज्ञान से भी संबंध है। विज्ञान कहता है कि पांच मिनिट तालियां बजाने से पूरे शरीर मे रक्त का संचार हो जाता है।तालियां विद्वान और मूर्ख दोनों बजाते हैं।विद्वान की तालियों की आवृत्ति और मूर्ख की तालियों की आवृत्ति,गति,ध्वनि में फर्क होता है। विश्व के दस फीसदी लोगों की बात ताली ठोके बिना पूरी नहीं होती है।
तालियों को सामाजिक मान्यता प्राप्त है।इन्हें अवैध कृत्य की श्रेणी में नहीं रखा जाता है।उचित अवसर पर ताली नहीं बजाने और बिना अवसर ताली बजाने पर निंदा का पात्र भी बनना पड़ता है।समाज में रहने वाले तृतीय श्रेणी के किरदारों ब्रह्ननलाओं की तालियां पूरे जगत में चर्चित और फूहड़ता की श्रेणी में गिनी जाती हैं।बृहन्नला जन्म से मृत्यु तक की यात्रा तालियों से पूरी करता है।तालियों से ब्रह्ननलाओं का मनोविज्ञान जुड़ा है।नृत्य,नाट्य विधा में भी तालियों की खास भूमिका है।तालियां हंसाती भी हैं।रुलाती भी हैं।तालियों के बिना जीवन अधूरा है।
(लेखक मप्र के वरिष्ठ एवं शासन द्वारा अधिमान्य स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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