साहब को रंज बहुत है, मगर आराम के साथ

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बुरा जो देखन मैं चला……

जमाखोरों और बिचौलियों के पांव के नीचे सरकार

राम मोहन चौकसे

भोपाल। कभी 40 पैसे से लेकर 2 रुपये किलो बिकने वाली प्याज आज 50 रुपये से लेकर 250 रुपये किलो तक बिक रही है।खून के आंसू रुला रही है प्याज।केंद्र से लेकर राज्य सरकारें प्याज पर बहुत चिंता जता रही हैं।जमाखोरों,बिचौलियों के कारण यह स्थिति पैदा हुई है।जमाखोरों,बिचौलियों ने सरकार को पांव के नीचे दबा रखा है।जमाखोरों, बिचौलियों के खिलाफ कार्रवाई और समस्या के समाधान के नाम पर दिखावा किया जा रहा है।माजरा कुछ यूं हो गया है-साहब को रंज बहुत है, मगर आराम के साथ।
बाजार में बढ़ी हुई कीमत को लेकर दो बार सरकार को हिला देने वाली प्याज ने अर्थशास्त्रियों के अनुमान को गलत साबित कर दिया है।किसानों की बोलती बंद कर दी है।फर्क इतना पड़ा है कि जमाखोरों,बिचौलियों की तिजोरियां लबालब भर गई है।सरकार चादर तानकर सो रही है।किसान प्याज की सस्ती और महंगी दरों के दौर में पहले की तरह तंगहाल है।सरकार ने देश से प्याज का निर्यात बंद कर थोक और फुटकर व्यापारियों के लिए स्टॉक की सीमा तय कर कर्तव्य की इति कर ली है।
केंद्र सरकार के कुप्रबंधन के कारण यह स्थिति निर्मित हुई है।सरकार ने कीमतों को नियंत्रित करने के लिए 5 सौ करोड़ रुपये का सस्टेनेबल फंड बनाया है।जो उपभोक्ताओं के लिए है,जबकि यह किसानों के लिए होना चाहिए।सरकार को इस बात का अंदाज था कि प्याज उगाने वाले राज्यों में नुकसान हो सकता है।इसके बाबजूद प्याज के निर्यात पर समय रहते रोक नही लगाई।इस वर्ष मार्च-अप्रैल में अधिक गर्मी तथा अत्याधिक बारिश के कारण प्याज की फसल बर्बाद हुई।फसल की बर्बादी के बाद भी केंद्र सरकार ने जून, जुलाई, अगस्त में पौने पांच लाख क्विंटल प्याज निर्यात कर दी।सितंबर 2019 में निर्यात पर रोक लगने तक 423 करोड़ रुपये का प्याज विदेश भेजा जा चुका था। जनवरी से सितंबर तक ढाई हजार करोड़ रुपये की प्याज देश से बाहर भेज दी गई।
पूरे देश मे प्याज की कीमतों को लेकर हाहाकार मचने पर सरकार नींद से जागी।9 नवम्बर को प्याज आयात करने का फैसला लिया गया।मिस्र से 6 हजार और तुर्की से 11 हजार टन प्याज आयात करने का एलान किया गया है।आंकड़ों की बात करें तो वर्ष 1917 में प्याज इतनी सस्ती हुई कि दो रुपये किलो तक बिकी।किसानों ने लागत नहीं निकलने पर सड़कों पर प्याज फेंकी।खेतों में आग लगा दी।यह भी एक रिकॉर्ड है कि 2019 में पहली बार 15 हजार रुपये प्रति क्विंटल तक प्याज के भाव पहुंच गए। सम्भवतःपहली बार खेत से प्याज की फसल चोरी होने का मामला सामने आया।भोपाल में मार्च माह में प्याज के बम्पर उत्पादन से मंडी में प्याज के खरीददार नहीं मिले।मप्र सरकार ने किसानों को राहत देने के लिए ओसत मूल्य पर प्याज ख़रीदकर मंडी में खुले आम नीलामी की।जमाखोरों ने औने पौने दामों में प्याज खरीदकर गोदाम भर लिए।सड़कों पर ट्रालियों से प्याज बेची गई।प्राकृतिक आपदा होते ही प्याज के भाव आसमान छूने लगे।सरकार ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि सस्ती दरों पर खरीदकर जमाखोरों के गोदामों में रखी प्याज के भाव बीस गुना कैसे बढ गए।
प्रदेश सरकार के जिला खाद्य अधिकारियों ने किसी भी जमाखोर के स्टॉक की जांच नहीं की है।जमाखोरों के गोदामों में छापे नही मारे गए।दिखावे के लिए धमकी भरी समझाइश दी गई।पूरे प्रदेश में जमाखोरों, बिचौलियों का कब्जा है।राज्य सरकार अपनी बला टालने के लिए केंद्र सरकार की नीतियों को कोसते हुए विपक्ष को केंद्र सरकार से मदद दिलवाने की सलाह दे रही है।किसानों की माने तो प्याज की फसल तैयार होने में 4 से 6 माह का समय लगता है।साल में दो बार प्याज की पैदावार होने के बाद किसान को सिर्फ लागत मूल्य मिल पाता है।बिचोलिये और जमाखोर किसानों के खेत से सौदे के सौ गुना मुनाफा कमा रहे हैं।बिल्ली के आने पर आंख मूंद लेने वाले तोते की भूमिका सरकार निभा रही है।
(लेखक मप्र के वरिष्ठ एवं शासन द्वारा अधिमान्य स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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