शहर के टोपीबाज नगरसेन

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व्यंग्य

राम मोहन चौकसे

सार्वजनिक समारोह में उनसे अचानक मुलाकात हो गई।दूर से देखा तो महसूस हुआ,चेहरा जाना पहचाना है।आंखों पर चश्मा चढ़ाया।दस कदम आगे बढ़कर उनके पास गया।गौर से देखा।दिमाग पर जोर दिया(जो अपने पास नहीं है)तो याद आया कि यह तो अपने शहर के मशहूर टोपीबाज नगरसेन हैं।कुछ लोग दबी जुबान से उन्हें शनि महाराज भी कहते है। पांच मिनिट में छह बीड़ी पीने में महारती,सामने वाले व्यक्ति से चंद क्षणों में रुपये,वस्त्र,बीड़ी के बंडल,फल , मेवे सहित अन्य भौतिक वस्तुएं झटक लेने की कला में महारत हासिल होने के कारण शनि महाराज कहा जाता है। टोपीबाज नगरसेन को पहचानने में दिक्कत इसलिए हुई क्योंकि उनके सिर पर चिर परिचित काली रंग की टोपी नदारत थी।सिर पर सफेद खिचड़ीनुमा बालों की नुमाइश थी।दुआ-सलाम के बाद नगरसेन से पूछा-आपकी पहचान टोपी कहां है?टोपीबाज नगरसेन ने ठंडी सांस भरी और कहा कुछ मत पूछो।दुःख भरी दास्तान है।हमने उन्हें हौसला रखने की सलाह दी।टोपी नगरसेन ने आह भरते हुए बताया,महिलाओं ने टोपी चुरा ली है।अब चौकने की मेरी बारी थी।उन्होंने विस्तार से बताया कि साल में एक बार लगने वाले महिलाओं के मेले में बतौर अतिथि उन्हें बुलाया गया था।मंच पर भाषण के दौरान एक छायाकार ने टोपी उतारकर फोटो खिंचवाने का आग्रह किया।फोटोग्राफर की फरमाइश पर टोपी उतारकर मंच के नीचे मेज पर रख दी।भाषण खत्म होने पर मंच से नीचे आने पर टोपी गायब थी।महिलाओं का मेला होने के कारण पुरुषों की उपस्थिति नहीं के बराबर थी।यह तय हो गया कि महिलाओं ने ही टोपी गायब की अथवा चुरा ली। टोपीबाज नगरबाज ने भी तय कर लिया कि जब तक वही पुरानी टोपी नहीं मिल जाएगी।सिर पर दूसरी टोपी धारण नहीं करेंगे।कई लोगों ने उन्हें टोपी पहनाने की कोशिश की।नाकामयाब रहे।टोपी स्त्रीलिंग संज्ञा है। बड़े आकार की टोपी को टोपा कहा जाता है।टोपा पुल्लिंग संज्ञा है।बर्तन के ऊपर कटोरानुमा साँचा को देखकर टोपी बनाने का विचार मन मे आया था। नादिरशाह और अहमदशाह के सिपाही लाल रंग की टोपी पहनते थे।टोपी पहनने का चलन तुर्की से शुरू हुआ था। शहर के टोपीबाज नगरसेन पहले टोपी नहीं पहनते थे।उम्र बढ़ने के साथ सिर के बालों की सफेदी ढांकने के लिए नगरसेन ने टोपी पहनने की शुरुआत की।नगरसेन को लोगों ने शवयात्रा,जुलूस-जलसा,शादी समारोह,तीज त्यौहार, सफर में कभी बिना टोपी नहीं देखा था।ओसत से कम कद होने के बाद टोपी पहनने से नगरसेन खेत में खड़े बिजूका से कम नहीं लगते थे।कई लोग उन्हें बिना टोपी के रहने तथा जोकर बनकर नही रहने की सलाह भी देते थे।नगरसेन को टोपी इतनी प्रिय थी कि सोते समय भी सिर पर टोपी रहती थी।नगरसेन की धर्मपत्नि भी टोपी को लेकर मिलने वाले तानों से तंग आ चुकी थी।नगरसेन की धर्मपत्नि ने महिला मेला की आयोजक पदाधिकारियों से मिलकर उनके पति को अतिथि बनाने और टोपी गायब करने की योजना बनाई थी।टोपीबाज नगरसेन को अभी भी उम्मीद है, टोपी जरूर मिलेगी। (लेखक मप्र के वरिष्ठ एवं राज्य शासन द्वारा अधिमान्य स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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