किसको-किससे आजादी चाहिए

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बुरा जो देखन मैं चला…..।

राम मोहन चौकसे

aajadiकोलकाता के विक्टोरिया स्मारक प्रांगण में 21 जनवरी को आजादी चाहिए के नारे लगाए गए।नारे लग रहे थे-कश्मीर में आजादी चाहिए।आसाम में आजादी चाहिए।नारे तो भारत माँ से आजादी के भी लगाए गए। नारे लगाने वाली छात्राएं-छात्र जादवपुर विश्वविद्यालय के थे।यह सभी छात्र-छात्राएं वामपंथी विचार धारा के कट्टर समर्थक हैं।जो भारत विरोधी गतिविधियों में संलग्न रहते है।नागरिक संशोधन कानून के विरोध में देश के कुछ चुनिंदा स्थानों चल रहे प्रदर्शन आंदोलन की यह बानगी है।
सी ए ए, एन सी आर का विरोध दिल्ली के शाहीन बाग,लखनऊ,मेरठ,इटावा,बंगलुरू,हैदराबाद और भोपाल में हो रहा है।यह प्रदर्शन कांग्रेस शासित राज्यो में ना के बराबर है।दिल्ली के शाहीन बाग में एक माह से मुख्य सड़क पर धरना जारी है।दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश पर पुलिस की समझाईश के बाद भी महिलाएं टस से मस नही हो रही है। दिल्ली सहित देश के कई हिस्सों में चल रहे धरना, प्रदर्शन में शामिल महिलाओं को सी ए ए के बारे कोई जानकारी नहीं है।मीडिया कर्मियों के पूछने पर एक रटा रटाया जबाब हाजिर रहता है।हम काला कानून का विरोध कर रहे है।जब तक काला कानून वापस नहीं होगा।आंदोलन जारी रहेगा।

इन आंदोलन,प्रदर्शन की संदिग्धता इस बात से जाहिर हो जाती है कि किसी व्यक्ति अथवा संगठन की अगुआई में आंदोलन नही हो रहा है।हर दिन टेंट, बिजली, लाऊड स्पीकर, चाय, नाश्ता, दो वक्त के भोजन पर हजारों रुपये फूंके जा रहे हैं।इन आंदोलन के पीछे ऐसे व्यक्तियों का हाथ है,जो देश मे नफरत फैलाना चाहते हैं।ऐसे आंदोलनों ने कुछ सवाल खड़े कर दिए है,जिनका उत्तर ढूंढना मुश्किल है।जो महिलाएं पराये मर्दों से पर्दा करना पसंद करती हैं। वे बेपर्दा होकर पराए मर्दों के साथ सड़कों पर प्रदर्शन कर रहीं है।ऐसे आंदोलन 8-8 घण्टे की पारी में हो रहे हैं।8 घंटे के पांच सौ रुपये प्रति प्रदर्शनकारी को दिए जा रहे हैं।आज के दौर में कोई इतना समर्पित कार्यकर्ता नही है,जो घर का चूल्हा चौका छोड़कर प्रदर्शन में शामिल हो।बारह साल के बच्चे भी ऐसे प्रदर्शनों की भीड़ का हिस्सा बन चुके हैं।

सवाल यह भी है कि आजादी के नारे लगाने वाले किस बात की आजादी मांग रहे है।यह लोग कश्मीर में कौन सी आजादी चाहते हैं।वामपंथी विचारधारा के अनुयायी और समर्थकों ने 1990 में पांच लाख कश्मीरी पंडितों के कत्ले आम,पलायन, दुष्कर्मों,1984 के सिख नरसंहार,मुम्बई बम कांड के खिलाफ कभी आवाज नही उठाई।भारत के खिलाफ बगावती बीज बोकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी,जादवपुर विश्वविद्यालय,जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी,जवाहर लाल यूनिवर्सिटी में पौध तैयार करने वाले देशद्रोही आजाद भारत मे आजादी के नारे लगाकर संविधान की धज्जियां उड़ा रहे है।जिनकी जगह जेल में होना चाहिए,वह खुली हवा में सांस लेकर भारत माँ को गालियां बक रहे हैं।यह वही लोग हैं , जो आतंकी याकूब मेनन को फांसी दिए जाने के खिलाफ रात को

3 बजे सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं।टुकड़े टुकड़े गैंग के लोग पूरे देश को नफरत की आग में झोंक देना चाहते हैं।विरोध व्यक्ति अथवा संस्था का हो सकता है,देश का नहीं।

(लेखक मप्र के वरिष्ठ एवं राज्य शासन द्वारा अधिमान्य स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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