बिना जागे सवेरा नहीं होगा

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बुरा जो देखन मैं चला…..।

राममोहन चौकसे

newsप्रदेश की राजधानी में उत्सव सा माहौल है। सुबह से लेकर देर रात तक कचरा ढोने वाली गाड़ियां चहुं दिशा में दौड़ रहीं हैं।स्वच्छता के प्रति जागरूक करने वाले संदेश गीत बजाकर गाड़ियां दौड़ रही है।कचरा वाला आया घर से कचरा निकाल… संदेश गीत बच्चों की जुबां पर चढ़ गया है।महीनों की कवायद के बाद सफाई के नाम पर शोर शराबा,दिखावा ज्यादा,औपचारिकता पूरी करने की हड़बड़ी, अफसरों की खाना पूर्ति करने की रस्म अदायगी,स्थल का निरीक्षण नही करने के वावजूद आंकड़ों की बाजीगरी के साथ ढोल पीटना,सफाई दरोगाओं को मिली ई बाइक सड़क से नदारद रहने,कार्यकाल पूरा कर रहे पार्षदों की अरुचि राजधानी के लिए एक नम्बर का सफाई का आंकड़ा छूने में पीछे रहने का ठोस कारण बन गया है।

भोपाल नगर निगम को पांच वर्ष पूर्व स्वच्छता के पूरे देश मे दूसरा स्थान प्राप्त हुआ था।दूसरे बार हुए सर्वेक्षण में भोपाल 19 वें स्थान पर तथा अभी पांचवें स्थान पर है।सफाई सर्वेक्षण में तालाब,पार्क, नाले नालियां,सड़के,गालियां,खुले में शौच से मुक्ति,सफाई कर्मियों की वर्दी,दस्ताने,सूखा -गीला कचरा का अलग निष्पादन, कचरा नहीं जलाने,मेडीकल वेस्ट को नियमानुसार निष्पादन करने सहित एक दर्जन बिंदुओं पर अंको का निर्धारण किया गया है।केंद्र के अधिकारियो को यह दायित्व सौपा गया है कि वह पूरे देश में भ्रमण कर हर बिंदु पर अलग अलग अंक प्रदान करें।पांच वर्ष पूर्व केंद्र से आये सर्वेक्षण अधिकारियों की जानकारी नगर निगम के ऐसे अधिकारियों को थी,जो अजगर करे ना चाकरी….के मूल मंत्र पर भरोसा करते है।केंद्र के अधिकारी नगर निगम की मेहमानबाजी में उन्ही गलियों में घूमे,जहां अधिकारियों ने घुमाया। नतीजा यह हुआ कि भोपाल सफाई में दूसरे स्थान पर आ गया।

दो वर्ष पूर्व विशाखापत्तनम जैसे बड़े नगर में दिन और रात के हर प्रहर में घूमने का सौभाग्य मिला। सात दिवसीय प्रवास में समुद्र तट से लेकर सड़को और गलियों में कागज की कतरन देखने नहीं मिली।पूरे शहर की दीवारें आकर्षक चित्रकारी से सजी मिली।पार्क व्यवस्थित मिले।अफसोस विशाखापत्तनम जैसा नगर सफाई की दौड़ में पीछे रह गया।भोपाल में सफाई में पीछे रहने के चार प्रमुख कारण हैं।पहला कारण यह है कि नगर निगम के अधिकांश अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर है।उनका मूल विभाग नहीं होने,नगर निगम को चारागाह समझकर काम नही करने की मानसिकता है। दूसरा कारण है सफाई कर्मचारी।सफाई कर्मचारी भी दो प्रकार के हैं।एक वह जो ईमानदारी से ड्यूटी को अंजाम देते है।दूसरे वह जो पूरे हफ्ते गायब रहकर दरोगा से हाजरी लगवा लेते है। बदले में दरोगा को भेंट चढ़ाना पड़ती है।यह राशि उचित माध्यम से ऊपर तक पहुंचती है।तीसरा कारण जिम्मेदारों द्वारा नियमित निरीक्षण नहीं करना,मुख्य सड़क छोड़कर गलियों की सफाई नहीं होना,कचरा उठाकर नालियों में भर देना है।चौथा सबसे अहम कारण नागरिकों का जागरूक नहीं होना है।
भोपाल एक सूक्षम भारत की तस्वीर है।हर प्रान्त का नागरिक यहां बस गया है।वर्षों नौकरी,धंधा करने के बाद भोपाल में बस जाने के बाद उनके मन में अपने शहर की अनुभूति नहीं होती है।पान की पीक की पच्चीकारी तथा पुराने शहर के प्रमुख स्थानों पर सफाई नही होना एक बदनुमा दाग है।पूरे देश मे इंदौर को सफाई में एक नम्बर का तमगा इसलिए मिला है,क्योंकि इंदौर में पीढ़ियों से रहने वालों को अपना शहर होने का अहसास है।लोग जागरूक हैं।इंदौर में किसी अजनबी व्यक्ति द्वारा कचरा,तम्बाकू के गुटके की कतरन फेंकने पर कोई भी इंदौरवासी संबंधित व्यक्ति से कचरा उठवाकर कूड़ेदान में फिकवाकर ही दम लेता है।इंदौर में किराना, फल,सब्जी,ऑटोमोबाइल,स्टेशनरी,कम्प्यूटर, टी वी, फ्रिज सहित अन्य सामान बेचने वालों की दुकानों पर गीले और सूखे कचरे के दो कूड़ादान रखे गए हैं।सुबह से शाम तक बिना दिखावे वाली सफाई होती है।राजधानी में जागरूकता आई है,गति धीमी है।यह तो तय है बिना जागे सवेरा नहीं होगा।

(लेखक मप्र के वरिष्ठ एवं राज्य स्तरीय अधिमान्य स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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